विवेकानंद
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स्वामी विवेकानंद को वाराणसी में ही हो गया था मृत्यु का आभास।

4 जुलाई को स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि  आज के दिन पर मनाया जाता है। उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक नेताओं और विद्वानों में से एक माना जाता है। विवेकानंद ने योग और वेदांत के दर्शन को पश्चिम देशों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपने भाषण के लिए जाना जाता है। उन्होंने धर्म संसद में अपने भाषण की शुरुआत ‘अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों’ के साथ थी।

स्वामी विवेकानंद का निधन मात्र 39 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई, 1902 को हुआ। उस समय वे पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में रह रहे थे। जिन लोगों ने उनके काम और व्याख्यानों का अनुसरण किया हैं। प्रगतिशील दर्शन के बारे में जानते हैं, उन्होंने उन्हें दुनिया भर में एक लोकप्रिय व्यक्ति बना दिया। विवेकानंद को 19वीं सदी में अतरधार्मिक जागरूकता बढ़ाने और हिंदू धर्म को वैश्विक मंच पर लाने का श्रेय दिया जाता है। वह विज्ञान और धर्म में अपने गहन ज्ञान के लिए भी जाने जाते हैं।

विवेकानंद
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जानें स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कैसे हुई थी।

विवेकानंद स्वामी को अंतर-धार्मिक जागरूकता बढ़ाने का श्रेय दिया गया है। 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में एक बंगाली परिवार में जन्मे और  शुरुआती जीवन में नरेंद्र नाथ दत्त के नाम से जाने जाते थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्ता थे।  जो कलकत्ता हाई कोर्ट में एक वकील थे। जबकि उनकी मां, भुवनेश्वरी देवी एक गृहिणी थीं।

बहुत कम उम्र से, विवेकानंद आध्यात्मिकता में रुचि रखने लगे थे और हिंदू देवी-देवताओं की छवियों के सामने ध्यान लगाते थे। पश्चिमी दर्शन और इतिहास में उनकी विशेष रुचि थी। विवेकानंद को अक्सर ईश्वर के अस्तित्व के बारे में संदेह से घेर लिया जाता था। इसी पश्न के साथ उनकी मुलाकात श्री रामकृष्ण से हुई, जो बाद में उनके गुरु बने।

स्वामी विवेकानंद पांच बार काशी आए थे। उनको काशी में ही अपनी मृत्यु का आभास हो गया था। इसका जिक्र उन्होंने अपने पत्र में भी किया था। एलटी कॉलेज परिसर के गोपाल लाल विला में प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने सात पत्र लिखे थे। चार जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। उन्होंने 39 वर्ष पांच माह, 24 दिन की अल्प आयु में शरीर त्याग दिया था। वर्ष 1902 में जब वो बनारस आए तो बीमार थे। यहीं ठहरे व एक माह तक स्वास्थ्य लाभ किया। 4  जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए।

विवेकानंद
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39 साल में ही दुनिया छोड़ गए थे स्वामी विवेकानंद।

उन्होंने 39 वर्ष पांच माह, 24 दिन की अल्प आयु में शरीर त्यागा। स्वामी विवेकानंद ने काशी भ्रमण के दौरान ही शिकागो जाने का निर्णय लिया था। उन्होंने वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि यानी आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा।

स्वामी पर अध्ययन कर रहे नित्यानंद राय ने बताया कि स्वामी ने काशी के अंतिम प्रवास के दौरान गोपाल लाल विला से सात पत्र लिखे थे।9 फरवरी 1902 को स्वामी स्वरूपानंद को लिखे पत्र में विवेकानंद  ने कहा था कि काशी प्रवास के दौरान मुझे बौद्धधर्म के बारे में बहुत सा ज्ञान प्राप्त हुआ।

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बौद्धों ने शैवों के तीर्थस्थल को लेने का प्रयास किया लेकिन असफल होने पर उन्हीं के नजदीक नए स्थान बनाए, जैसे बोध गया, सारनाथ आदि। अपने शिष्य चारू को कहते हैं कि वह ब्रह्म सूत्र का स्वयं अध्ययन करे और मूर्खतापूर्ण बातों से प्रभावित ना हो। वह आगे लिखते हैं कि काशी में अच्छा हूं और यदि इसी तरह मेरा स्वास्थ्य सुधरता जाएगा तो मुझे बड़ा लाभ होगा लेकिन  कि बौद्ध धर्म और नव हिंदू धर्म  संबंध के विषय में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है।

कैसे और कहां हुई थी स्वामी विवेकानंद की मृत्यु।

इन विचारों को निश्चित रूप देने के लिए कदाचित मैं जीवित ना रहूं, परंतु उसकी कार्यप्रणाली का संकेत छोड़ जाऊंगा और तुम्हें और तुम्हारे भाई जनों  को उस पर काम करना होगा।

दूसरा पत्र 10 फरवरी को ओली बुल को लिखा था।  और इसमें काशी के कलाकारों की प्रशंसा की थी। 12 फरवरी को भगिनी निवेदिता को लिखे गए पत्र में आशीर्वाद देते हुए लिखा था। कि यदि श्रीरामकृष्ण सत्य हों तो उन्होंने जिस प्रकार मेरे जीवन में मार्गदर्शन किया है ठीक उसी प्रकार तुम्हें भी मार्ग दिखाकर अग्रसर करते रहें। चौथे पत्र में स्वामी ब्रह्मानंद को  लिखते हुए आदेशित किया कि प्रभु के निर्देशानुसार कार्य करते रहना।

फरवरी को  ब्रह्मानंद को और 21 फरवरी को ब्रह्मानंद को लिखे पत्र में स्वामी ने कहा था कि कलकत्ते और इलाहाबाद में प्लेग फैल चुका है, काशी में फैलेगा कि नहीं, नहीं जानता। अंतिम पत्र में 24 फरवरी को ब्रह्मानंद को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने पत्र का जवाब नहीं लिखने पर नाराजगी जताई और लिखा।

कि एक मामूली सी चिट्ठी लिखने में इतना कष्ट और विलंब।तो मैं चैन की सांस लूंगा। पर कौन जानता है उसके मिलने में कितने महीने लगते हैं और 4 जुलाई 1904 को वे महासमाधि में लीन हो गए।

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हिन्दू धर्म का पुनरूद्धार किया। 

आरएसएस के राम कुमार गुप्ता ने बताया कि 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ और मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आने पर स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए। संकठा मंदिर के पीछे स्थित कात्यायनी मंदिर के गर्भगृह में आत्म  विराजमान हैं जिसकी दीवारों पर स्वामी विवेकानंद के माता-पिता भुवनेश्वरी देवी व विश्वनाथ दत्त की भी तस्वीर लगी हैैं।

24 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1887 में पहली बार काशी आए और गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगा स्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्रा से मुलाकात हुई। प्रमदा दास जी को अपने घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला जारी हुआ। स्वामी औरंगाबाद सोनिया रोड पर अपनी शिष्य मां बसुमति के यहां भी ठहरे थे। जिस पलंग पर स्वामी ने आराम किया था।  उसे आज भी सुरक्षित रखा गया है। आज भी इस पलंग की पूजा और आरती की जाती है।

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