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बॉलीवुड के टॉप 3 विलन अभिनेता जिन्होंने पूरी दुनिया में अपना लौह मनवाया Top 3 Villain of Bollywood
 

नमस्कार दोस्तों आज हम बात करेंगे हमारे फिल्म इंडस्ट्री के टॉप 3 विलेन एक्टर की जिन्होंने अपनी एक्टिंग के दम पर पूरी दुनिया में अपना लौह मनवाया है। जैसा की दोस्तों आप सभी जानते है की एक कहानी के दो किरदार होते है पहला अच्छा तो दूसरा बुरा। पहला जिसका किरदार होता है वो होता है हीरो का यानी की वो फिल्म की मदद से हम सबको अच्छे सन्देश देने की कोशिश करता है जबकि दूसरा होता है विलन जो की फिल्म की जान होता है उसी के ऊपर पूरी फिल्म डिपेंड होती है अगर देखा जाए तो बॉलीवुड में ऐसे कुछ खलनायक है जिन्होंने अपनी एक्टिंग और टेलेंट के दम पर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी एक्टिंग के लिए मशहूर हो गए और आज भी दुनिया इनको इनकी अदाकारी के लिये जानती है। तो दोस्तों अब बिना समय लगाए चलिए हम जानते है उनके बारे में। 

अमरीश पूरी (1932-2005)

मुझे नहीं लगता दोस्तों इनके बारे में जानकारी देने की कोई जरुरत होगी क्योंकि ये बॉलीवुड के ऐसे खतरनाक विलेन थे जिनकी आवाज सुनकर एक बार खुद फिल्म का हीरों काँप जाता था। जी हाँ दोस्तों हम बात कर रहे है हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े और चर्चित विलन अमरीश पूरी के बारे में जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक नए मुकाम पर पहुँचाया है। अमरीश पुरी के अंदर ऐसी अद्भुत क्षमता थी कि वह जिस रोल को करते थे वह सार्थक हो उठता था। अगर आपने उन्हें मिस्टर इंडिया के मोगैंबो के रोल में देख कर उनसे नफरत की थी तो उन्होंने ही “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” में सिमरन का पिता बन सबके दिल को छू लिया था। अमरीश पुरी हर किरदार में फिट होने वाले एक आदर्श अभिनेता थे। आपको बता दूँ की फ़िलहाल वह हमारे बीच में नहीं है 2005 में अमरीश पूरी साहब हम सबको अलविदा कहकर चले गए थे। अमरीश पूरी ने 1970 से लेकर 2005 के बीच में 400 से अधिक फिल्मों में काम किया है। 

अमरीश पुरी के फ़िल्मी करियर शुरुआत साल 1971 की ‘प्रेम पुजारी’ से हुई। पुरी को हिंदी सिनेमा में स्थापित होने में थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन फिर कामयाबी उनके कदम चूमती गयी। 1980 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई बड़ी फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। 1987 में शेखर कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया में मोगैंबो की भूमिका के जरिए वे सभी के जेहन में छा गए। 1990 के दशक में उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘घायल’ और ‘विरासत’ में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए सभी का दिल जीता।

अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्‍साहित होते थे।
 

अमजद खान (1940-1992)

जैसा की दोस्तों आपको गब्बर सिंह तो याद होगा ही है भला उसे कौन भूल सकता है। आपको बता दूँ की अमजद ख़ान ने बतौर कलाकार अपने अभिनय जीवन की शुरूआत वर्ष 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ से की थी। इस फ़िल्म में अमजद ख़ान ने बाल कलाकार की भूमिका निभायी। वर्ष 1965 में अपनी होम प्रोडक्शन में बनने वाली फ़िल्म ‘पत्थर के सनम’ के जरिये Amjad Khan ने बतौर अभिनेता अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाले थे, लेकिन किसी कारण से फ़िल्म का निर्माण नहीं हो सका। सत्तर के दशक में अमजद ख़ान ने मुंबई से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बतौर अभिनेता काम करने के लिये फ़िल्म इंडस्ट्री का रुख किया। अमजद को ख़ास तोर पर फिल्म शोले के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई सारी हिंदी फिल्मों में काम किया है जिनमे से ये मुख्य है ‘आखिरी गोली’, ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘चक्कर पे चक्कर’, ‘लावारिस’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘बेसर्म’, ‘अपना खून’, ‘देश परदेश’, ‘कसमे वादे’, ‘क़ानून की पुकार’, ‘मुक्कद्दर का सिकंदर’, ‘राम कसम’, ‘सरकारी मेहमान’, ‘आत्माराम’, ‘दो शिकारी’, ‘सुहाग’, ‘द ग्रेट गैम्बलर’, ‘इंकार’, ‘यारी दुश्मनी’, ‘बरसात की एक रात’, ‘खून का रिश्ता’, ‘जीवा’, ‘हिम्मतवाला’, ‘सरदार’, ‘उत्सव’ आदि है। 1940 में जन्मे अजमद खान की मौत 1992 में हो गई थी। 

डैनी डेन्‍‍जोंगपा (1948-अभी तक)

डैनी डेन्‍‍जोंगपा बॉलीवुड के सबसे स्टाइलिश खलनायक माने जाते है। 25 फ़रवरी, 1948 को सिक्किम में जन्में डैनी का पूरा वास्तविक नाम शेरिंग फिंसो डेंग्जोंग्पा है। हिन्दी फिल्मों के दर्शक भले ही उन्हें खलनायक समझते हों, लेकिन उससे भी पहले वे गायक हैं, चित्रकार हैं, लेखक हैं, संगीतकार हैं और माली हैं। पर्यावरण के संरक्षक हैं। पर्यटक हैं। बीयर फैक्टरी के मालिक होकर सफल व्यवसायी हैं। इतने सारे चेहरों से सुकून की जिंदगी जीने वाले वे एक भले इंसान हैं। उनका छोटा-सा नाम है, डैनी (डेंग्जोंग्पा)। यह नाम जया भादुड़ी का दिया हुआ है, जो पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान के एक्टिंग कोर्स में उनकी सहपाठी रही हैं। 

हिन्‍दी फिल्‍मों के साथ साथ उन्‍होंने नेपाली, तेलुगु और तमिल फिल्‍मों में भी काम किया है। उन्‍होंने हॉलीवुड फिल्‍मों में भी काम किया हैा डैनी को पद्मश्री सम्‍मान भी मिल चुका है। वे अपने खलनायक और सहायक अभिनेता के किरदारों के लिए जाने जाते हैं। उन्‍होंने कई फिल्‍मों में अपनी खलनायकी से लोगों के दिलों में दहशत पैदा की है। उनके करियर की शुरूआत फिल्‍म 'जरूरत' से हुई थी लेकिन फिल्‍म 'मेरे अपने' में उन्‍होंने सकारात्‍मक भूमिका निभाई। उन्‍होंने पहली प्रमुख नकारात्‍मक भूमिका फिल्‍म 'धुंध' में निभाई। इसके बाद वे कई फिल्‍मों में दिखाई दिए और उनके अभिनय का कमाल सभी ने देखा। आलोचकों और जनता ने हमेशा से ही उनको सराहा है। फिल्‍म 'घातक' में उनके द्वारा निभाया गया किरदार 'कात्‍या' आज भी लोगों को भुलाए नहीं भूलता। 

उनकी कुछ ख़ास फिल्मे मेरे अपने (1971), धुँध (1973), चोर मचाए शोर (1974), खोटे सिक्के (1974), काला सोना (1975), लैला मजनू (1976), फकीरा (1976), कालीचरण (1976), संग्राम (1976), लाल कोठी (1978), अब्दुल्लाह (1980), काली घटा (1980), बुलंदी (1981), कानून क्या करेगा (1984), अंदर बाहर (1984), युद्ध (1985), जवाब (1985), ऐतबार (1985), प्यार झुकता नहीं (1985), खोज (1988), यतीम (1989), सनम बेवफा (1991), अग्निपथ (1990), हम (1991), खुदा गवाह (1992), घातक (1996) चाइना गेट (1998) पुकार (2000), 16 दिसम्बर (2002) रोबोट (2010), बैंग बैंग (2014), बेबी (2015), नाम शबाना (2017) इसके अतिरिक्त उन्होंने और कई फिल्मो में काम किया है।